हक़ीक़त में वो लुत्फ़-ए-ज़िंदगी पाया नहीं करते
हक़ीक़त में वो लुत्फ़-ए-ज़िंदगी पाया नहीं करते
जो याद-ए-मुस्तफ़ा से दिल को बहलाया नहीं करते
ज़बाँ पर शिकवा-ए-रंज-ओ-अलम लाया नहीं करते
नबी के नाम-लेवा ग़म से घबराया नहीं करते
अरे ओ ना-समझ ! कुर्बान हो जा उन के रौज़े पर
ये लम्हे ज़िंदगी में बार बार आया नहीं करते
ये दरबार-ए-मुहम्मद है, यहाँ अपनों का क्या कहना
यहाँ से हाथ ख़ाली गैर भी जाया नहीं करते
ये दरबार-ए-मुहम्मद है, यहाँ मिलता है बे-माँगे
अरे नादाँ ! यहाँ दामन को फैलाया नहीं करते
मुहम्मद मुस्तफ़ा के बाग़ के सब फूल ऐसे हैं
जो बिन पानी के तर रहते हैं, मुरझाया नहीं करते
जो उन के दामन-ए-रहमत से वाबस्ता हैं, ऐ हामिद !
किसी के सामने वो हाथ फैलाया नहीं करते
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